आज की नारी | Aaj ki Naari hindi kavita
शीर्षक- आज की नारी
मैं आज की नारी हूं
पढ़ लिखकर खुद के पैरों पर खड़ी हूं
रूढ़िवादी सोच को बदलकर
रोज एक नया इतिहास लिखती हूं।।
वो दौर अब बित गया जब
मेरी जिदंगी घर की चौखट तक ही सीमित थी
आज मैं किसी पर निर्भर नहीं
बल्कि खुद की तकदीर स्वयं लिखती हूं।।
घर परिवार की जिम्मेदारियों के साथ
आज मैं समाज का नेतृत्व भी करती हूं
बंद कमरों से निकल कर आज मैं
खुले आसमान में सांस लेती हूं ।।
सपने देखने का आज मुझे भी है अधिकार
अपने सपनों को साकार करने के लिए
मैं भी करती हूं हर संभव प्रयास
पाकर अपनी मंजिल को लिखती हूं एक नया इतिहास।।
मैं आज की नारी हूं
मुझें कमजोर समझने की भूल ना करना
कभी देश की सीमा पर आके देखों
देश की रक्षा में खड़ी मैं आज की नारी हूं।।
---------------------- जितेन्द्र बुधानी
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