बुजुर्गो की आशा | Old Couple | Hindi Poetry

 


बड़े प्यार से बनाया हमने घर अपना

रहते जिसमें मैं मेरी पत्नी व मेरे बच्चें

मेरी पत्नी जो हैं मेरे जीवन का आधार

हर एक दौर में दिया उसने मेरा साथ।।


घर को मेरे खुशियों से भर दिया

नन्हीं नन्हीं कलियों को खिलाकर

जीवन मेरा नये रंगों से भर दिया

इन मासूम कलियों को पाला-पोसा।।


कई त्याग किये हम दोनों ने

अपने कई शौक को मारा

भूल गए अपना निजी जीवन

लेकिन अपने बच्चों का हर ख्वाब पूरा किया।।


छोटे छोटे बच्चों से उन्हें, काबिल इन्सान बनाया

अपने मां-बाप होने की हर जिम्मेदारी को निभाया

इस आशा इस उम्मीद में कि ये कल हमारा सहारा बनेंगे

बुढ़ापे के दिन हमारे आराम से गुजरेंगे।।


आशा करते भी क्यों नही हम

ये हमारी अपनी औलाद थी

जिनको पालने व काबिल बनाने में

हम दोनों ने अपना पूरा जीवन खपा दिया।।


आज वहीं औलाद बढ़ी हो गई

अपने ख्वाबों की दुनिया में खो गई

पैसों की चमक उन्होंने अब देख ली

अपने शौक अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं।।


अपने मां-बाप के लिए उनके पास समय नही

अब बोझ से लगते है हम उनको

इसलिए हमें गांव में छोड़कर

वो अब शहर में रहते हैं।।


सबकुछ होने के बाद भी

हम आज अकेले रहते हैं

अपनी बेबसी पर रोते हैं

उम्र के इस पड़ाव में हम अकेले रहते हैं।।


सोचते है कभी ये वहीं बच्चें हैं

जिन्हें पाल पोस के हमने बढ़ा किया

हर दुख सहें हम दोनों ने

लेकिन इन्हें हर खुशियां दी।।


अगर ये वहीं औलाद हैं 

तो ऐसी औलाद भगवान किसी को न दें

कम से कम झूठी आशा उम्मीद तो नहीं रहेगी

उम्र के आखिरी दौर में 

ये मोह माया तो नहीं रहेगी।।


जो न चैन से जीने देती है

और न चैन से मरने देती है

जो बस बेबस लाचार होके

अपनी औलाद के इंतजार में रहती हैं।।









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